आदिवासी हिन्दु नहिं - क्योंकि 
( Indeginious People are Not Hindu ) 

   👇 संदर्भ प्रमाण 👇 
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विभिन्न न्यायालय के निर्णय, भारतीय संविधान,  आदिवासी संस्कृति,  बोली - भाषा,  देवी- देवता संबंधी मान्यता,  पुजा पद्धति, परंपरा,  रीति रिवाज, पुरातत्वीय शोध,  मानव वंश शास्त्र,  शरीर रचना विज्ञान, नस्ल -वंश इतिहास,  D.N.A Research ____ इत्यादि सभी तरह से सिध्द हुआ है कि आदिवासी हिन्दु नहिं है |

     👉 न्यायालयीन निर्णय 👈​​​​​

1)  माननीय सुप्रीम कोर्ट - Case No.- 10367 of 2010 - (5 Jan. 2011) ( भील  ) 
2)  मान. हाईकोर्ट जबलपुर  (  म. प्रदेश  ) - रेवन्यू निर्णय  100 / 1990 रामगुलाम बनाम नारायण  ( बहेलिया )
3)  मध्य प्रदेश रेवन्यू निर्णय क्र. - 191/1980 - रामवती बनाम सहोदरी बाई  ( हल्बा ) 
4)   मान. कुटुंब न्यायालय,  बालोद  ( छ. ग. ) - बनिहारीन बाई बनाम जोहरु राम भोयर ( हल्बा ) 
प्रकरण क्र. — 3/07 दिनांक  06/10/2009 
5)  सुचना के अधिकार  ( R.T.I.) के तहत -- आदिवासी हल्बा समाज बालोद महासभा से प्राप्त दस्तावेज - सु. अ. /09/64 - दिनांक  15 सितम्बर  2009 
6)  मध्य प्रदेश लो जनरल - प्रकरण क्र. -  21 / 1971 - त्रिलोक सिंह विरुद्ध गुलबसिया बाई  ( गोंड  )
7)  आदिवासी कमेटी के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा का संविधान सभा मे भाषण 
( संविधान सभा की चर्चाए , ओफिसियल रिपोर्ट,  खंड - 9, खंड - 11 ) 
प्रकाशक  - लोकसभा सचिवालय,  नई दिल्ली. 1999 
👉  हिन्दु धर्म के चारो वर्ण  - ब्राहमण,  क्षत्रिय,  वैश्य,  शुद्र  में से आदिवासी किसी भी वर्ण मे नही आते | 
👉 हम आदिवासीयों की कोई भी प्रथा,  परंपरा,  मान्यता  एवं देवी - देवताओ का उल्लेख  हिन्दु धर्म ग्रंथो में कही नही है -- 👇​​​​​👇​​​​​👇​​​​​👇​​​​​
इसलिए  आदिवासी हिन्दु नहिं है |
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आदिवासी हिन्दु नहिं तो फिर - क्या है  ? 
जिस तरह - पानी = जल = वॉटर  = समानार्थी है 
जैसे - क्रिश्चियन धर्म = ईसाई धर्म  समानार्थी है 
जैसे - मुस्लिम धर्म = इस्लाम धर्म  समानार्थी है 
जैसे - आर्य धर्म = वैदिक धर्म = हिन्दु धर्म,  समानार्थी है 
👉 उसी तरह - आदिवासी धर्म = आदिम धर्म = गोंडी धर्म = कोया पुनेम = सरना धर्म = प्रकृति पुजक = जनजातिय धर्म आपस मे समानार्थी है अर्थात  हम " आदिवासी धर्म " के लोग है 
1901 की जनगणना मे अंग्रेजो ने - प्रकृति वादी लिखा था | 
1911 की जनगणना मे अंग्रेजो ने - जनजातीय धर्म / प्रकृति पुजक लिखा | 
1931 की जनगणना मे आदिम धर्म लिखा गया था | 
इस तरह अंग्रेजो ने भी हमारी विशिष्ट एवं अलग संस्कृति के आधार पर हमे हिन्दु नहिं माना था ॥
आदिवासी धर्म के  4 मूलाधार है - सत्य,  प्रकृति प्रेम,  भाई चारा,  प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत 
हमे जो भी संवैधानिक अधिकार मिला है वो हिन्दु होने से नही बल्कि आदिवासी होने से मिला है | 
हिन्दु होने से आज तक एक भी फायदा नही हुआ और भविष्य मे भी नही होगा 
॥ जय आदिवासी जागो आदिवासी ॥
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" #आदिवासी_का election नहीं,  बल्कि selection है और आदिवासी वोट के माध्यम से अपने खिलाफ कानून बनाने के लिए आदिवासी विधायक और सांसद को खुद आदिवासी समाज  के लिए कब्र का गड्डा खोदने को आमंत्रित करता है,

केन्द्र सरकार के तीन अंग होते हैं.. 
1.) कार्यपालिका-  प्रशासन और कानून लागू करना
2.) न्यायपालिका - मौजूदा कानूनों पर निर्णय देना
3.) विधायिका - कानून बनाना

प्रधानमंत्री   विधायिका (कानून ) के प्रति जवाबदेह होता है, और कार्यपालिका शक्ति(कानून लागू करवाना) का प्रधान राष्ट्रपति होते हैं  ..
वर्तमान में जिस तरह बहुमत की सरकार है, मान लिया जाए कि कोई कानून आदिवासी हित में नहीं है , तो सामान्यतः #आदिवासी_बुद्धिजीवियों के अनुसार  वह कानून आदिवासियों पर थोपा जा सकता है, क्योंकि #विधायिका और #न्यायपालिका भी बहुमत की सरकार की है, और #न्यायपालिका भी मौजूदा संविधान और सामान्य कानून के हिसाब से ही निर्णय देगी.. 
बुद्धिजीवियो के अनुसार 5वीं अनुसूची को राष्ट्रपति  संशोधित कर सकते हैं .. 😂😂

माने #चित_भी_उनकी_और_पट_भी.. 
इसी लिए वोट देकर हम अपने कब्र के लिए गड्डा खोदते हैं .. और यह जानते हुए भी #आदिवासी_बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए पूरे आदिवासी समाज को हाशिए पर ढकेलते आ रहे हैं ... 

#पर बधाई हो.. 
इन 70 सालों में जो नहीं हुआ, वो अब होगा.. 

          #हकीकत_और_खुलासा.. 
15 अगस्त 1947 के सत्ता के हस्तांतरण के पहले भारत सरकार GOI act 1935 से संचालित होती थी, 
GOI act 1935 के सेक्शन 311 में भारत को तीन भागों में बाँटा गया.. 
1.) भारत
2.) भारत का राज्य क्षेत्र 
3.) Tribal area..

#संविधान निर्माण के बाद संविधान में इसी सेक्शन के दो भागों  को पहली अनुसूची में डाला गया.. 
1.) भारत 
2.) भारत का राज्य क्षेत्र 
             #Tribal area( वर्जित क्षेत्र 91और आंशिक वर्जित क्षेत्र92)  को डाला नहीं गया, या कहा जाए, तो धोखा देकर उसे दो भागों संविधान में क्रमशः tribal area यानी 6वीं  अनुसूची(excluded area , सेक्शन92) के 4 राज्य और scheduled area ( partially excluded area, section  91) यानी 5वीं अनुसूची के 10 राज्य के रूप में  डाल दिया गया.. (पर इन 14 राज्य के कार्यपालिका शक्ति का विस्तार नहीं किया, क्यों कि  राष्ट्रपति जी को भी यह अधिकार प्राप्त नहीं है)

       #अब इससे सरकार को फायदा यह हुआ, कि IPC और CRPC में लिखा था, कि ये कानून Tribal area को लागू नहीं होंगे, अब धोखानुसार संविधान निर्माण के बाद tribal area के रूप में बस 4 राज्य में लागू होने लगे, और जानकारी के अभाव में 10 अनुसूचित राज्य में IPC , CRPC थोपे जाने पर आदिवासी जेल जाने लगे.. 😂😂

          #रामकृपाल_भगत_Vs_State_of_Bihar 1969 के सुप्रीम कोर्ट के 7 संवैधानिक खंडपीठ द्वारा दिए निर्णय में यह साफ लिखा है कि
5 वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्रों में अभी तक GOI 1935 के कुछ  सेक्शन प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू हैं .. इन क्षेत्रों में सामान्य कानूनों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है, और राज्यपाल के द्वारा  शासन , प्रशासन और नियंत्रण भी आदिवासी के लिए कल्याणकारी और GOI act 1935 के अंतर्गत ही होगा.. 

#और राज्यपाल के कार्यपालिका शक्ति के विस्तारीकरण के लिए "क्राऊन" या हिज मजेस्टी की अनुमति आवश्यक है.. 5वीं,  6ठी अनुसूची के संशोधन के लिए भी.. 
साथ ही लोक अधिसूचना(public notifications)  ना होने के कारण ये सारे थोपे गए सामान्य  कानून असंवैधानिक हैं .. 

#इसलिए हमारे गाँव में सामान्य कानून नहीं, ( पेसा भी सामान्य कानून है)  बल्कि "अबुआ दिसोम अबुआ राज " के तर्ज पे पारंपरिक ग्राम सभा  #माँझी,  #डोकलो सोहोर,  #मुण्डा मानकी,  पड़हा,  हजोर बूमकाल,  पटेल,  गमेती    का दस्तूर कानून यानी कि जिसमें #कार्यपालिका , #न्यायपालिका और #विधायिका की शक्ति और विधि का बल प्राप्त है , ही चलेगा.. 

#ना_लोक_सभा_ना_विधान_सभा
#सबसे_ऊँची_ग्राम_सभा ( सुप्रीम कोर्ट का वेदान्ता जजमेंट)

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जरा आखोंमे भर लो पानी,ये लोग भी शहीद हुये है आझादी के लिये,
जरा याद कर लो इनकी भी कुर्बानी…
अ. क्र. शहीद का नाम स्थान बलिदान दिवस
१) राजा शंकरशाह मडावी गढा मंडला १८ सितम्बर १८५७
२) राजकुमार रघुनाथशाह मडावी गढा मंडला १८ सितम्बर १८५७
३) तंट्या भिल्ल सेंधवा, बडवानी १८५७
४) नारायणसिंह सोनाखान सोनाखान, छत्तीसगढ १८५७
५) बाबुराव शेडमाके चांदागढ २१ अक्तूबर १८५८
६) बिरसा मुंडा रांची, बिहार ९ जून १९००
७) धानूगोंड मंडल मंडला १९२२
८) वीरशाह उईके बैतूल १९३०
९) गंजनसिंह कोरकू बैतूल १९३०
१०) मनकू धोडडोंगरी बैतूल १९३०
११) बुढान शाह पीथौरा १९३०
१२) राजाराम धुर्वे बैतूल १९४२
१३) बाबुराव कोकोडे बैतूल १९४२
१४) पोलस धुर्वे बैतूल १९४२
१५) लक्ष्मण नायक ओरिसा १९४२
१६) कुमराल भिमू आदिलाबाद बलिदान
१७) राणी फुलकुंवर जबलपूर बलिदान
१८) राणी सुगन कुवारी राजनांदगाव बलिदान
१९) बिरसा गोंड जीर्रा १९४२
२०) ननकू गोंड बैतूल १९४२
२१) मधुकर शाह नरसिंहपूर १९४३
२२) राणी पद्मावती मंडला १९४३
२३) राणी देवी कुंवर उईके हर्रई, छिंदवाडा १९४३
२४) राणी टिरमोनिन आत्राम चांदागड १९४३
२५) राणी सुंदरी मडावी चांदागड १९४३
और ऐसे बहुत सारे, जिनके बलिदान की इस दुनिया के इतिहासकारोंने दखल नही ली.

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🌾 *वारल्यांची चळवळ* 🌾
       *Warli movment*
        *1944 ते 1947*
       *( पालघर जिल्हा )*

       ब्रिटिश काळात Bombay Presidency विभागात ठाणे जिल्ह्यात ( आजचा पालघर ) आदिवासींचे जीवनमान अत्यंत हलाकीचे होते. *वेठबिगारी, लगीनगडी, घरगडी, खावटी, पालंमोड* या अन्याय पद्धतींनी आदिवासींचे जीवन उध्वस्त केले होते. सरकारी कर्मचारी, जमिनदार, सावकार, शेठ, कुप ठेकेदार हे आवारी पठानांच्या मदतीने जुलुम करत.
       ब्रिटिश काळात जमिनदार हे भूमिहीन आदिवासींना कूळ जमिनी कसायला द्यायचे आणि त्या मोबदल्यात धान्याचा 1/2  अथवा 1/3 हिस्सा *खंड ( rent )* घ्यायचे. शेतीच्या कामांसाठी दिवसाची मजुरी भाताची अर्धी अधेली इतकी कमी दिली जायची. तर गवत कापणीसाठी दोन ते तीन आणे दिवसाची मजुरी दिली जायची.
       *या सगळ्या अन्यायकारक परिस्थितीवर भड़का उठला तो 1944 पासून*. हा संघर्ष इतिहासात *वारल्यांची चळवळ* म्हणून ओळखला जातो. या भागात आदिवासींच्या ज्या जमाती आहेत, त्यामध्ये वारली जमातीची जनसंख्या जास्त आहे. म्हणून या चळवळीला *वारल्यांची चळवळ* असे नाव पडले.

     🔥 *घटनाक्रम*  🔥

🌄🌾 *या चळवळीची खरी सुरवात 1942 मध्ये उंबरगाव परिसरातून झाली*. जेव्हा The assistant Backward Class officer श्री. सावे यांनी येथील आदिवासींना सांगितले कि सरकारी कायद्यानुसार दिवसाची मजुरी 12 आण्या पेक्षा कमी  देणे हे बेकायदेशीर आहे. तेव्हा आदिवासींना पहिली सामूहिक जाणीव झाली की आपल्यावर अन्याय होतो आहे.
🌄🌾 म्हणूनच 1942 मध्ये उंबरगाव परिसरात  शेतमजुर, गवत कापणारे व कूप तोडणारे आशा 3000 आदिवासींनी  संप केला होता. पण हा संप सावकारांनी यशस्वी होऊ दिला नव्हता.
🌄🌾 त्यानंतर जानेवरी 1945 मध्ये गोदावरी परुळेकर ह्या या चळवळीत सक्रिय झाल्यावर खऱ्या अर्थाने चळवळीने जोर पकडला.
🌄🌾 चळवळवाल्यांनी वेळोवेळी सभा घेऊन, मोर्चे काढून आपल्या मागण्या मांडल्या. 2 मार्च 1945 रोजी *झरी* (तेव्हा उंबरगाव तालुक्यात. आता तलासरी) येथे 2500 आदिवासी जमले होते. 25 सप्टेंबर 1945 रोजी *कावडा* येथे 5000 आदिवासी जमले होते. तर 6 ऑक्टोबर 1945 रोजी  *नरपड* येथे 6000 आदिवासी जमले होते.
🌄🌾 6 ऑक्टोबर 1945 रोजी नरपड येथे डाहाणू , पालघर, उंबरगाव (तेव्हा ठाणे जिल्हातील एक तालुका) या तालुक्यातून साधारणपणे 40 गावांतुन लोक जमा झाले होते. *याच सभेमध्ये मजुरांनी काम बंदचा निर्णय घेतला*.
     येथे स्थानिक मजूर कार्यकर्ता  *गोविंद धाडगा* यांनी आपल्या या *नऊ मागण्या* वाचून दाखवल्या.
1. वेठबिगारी  कायमची नष्ट करण्यात यावी.
2. कुळावर वाढवलेला खंड ( rents ) कोणीही भरायचा नाही.
3. जमीनदारांना गवत, कडधान्ये ( ईदल ) आणि कोंबड्या - बक-या द्यायच्या नाहीत.
4. मागील तीन वर्षांपर्यंतचे थकलेले खंड ( rents ) व सावकारी कर्जाचा हप्ता कोणीही भरायचा नाही.
5. कुळांच्या जमिनीचे पुन्हा मोजमाप करुन खंडाचे नविन दर ठरविण्यात यावेत.
6. एक गंजी ( bale ) गवत कापण्याची मजुरी पुरुषांना एक रुपया आठ आणे तर महिलांना सोळा आणे दर देण्यात यावा.
7. लगीनगड्यांना महिन्याला 31 रुपये मजुरी देण्यात यावी. आणि त्याच्यातून त्यांच्या मालकांनी कर्जाचे हप्ते भरुन घ्यावेत.
8. आदिवासींना गुरे - ढोरे चारण्यासाठी गुरचरण निश्चित करण्यात यावे.
9. जोपर्यंत ताड़ी एक सेर या मापाला सहा पैसे या भावाने  विकली जात नाही, तोपर्यंत कोणीही ताड़ी प्यायची नाही. आणि आपल्या मुला - मुलींच्या लग्नाचा खर्च 50 रुपयांपेक्षा जास्त करायचा नाही.
🌄🌾 नरपडच्या सभेनंतर चळवळवाल्यांनी  मोठमोठे गट तयार करुन गावोगावी जाऊन वेठ्या, घरगडी, लगीनगडी यांना त्यांच्या मालकांच्या समोरासमोर ते स्वतंत्र आहेत असे घोषित केले.
🌄🌾 याच वातावरणात 8 ऑक्टोबर 1945 रोजी *कोसबाड* ( डाहाणू ) येथे 7000 आदिवासींची सभा संपन्न झाली.
🌄🌾 दिनांक 10 ऑक्टोबर 1945 रोजी  *तलवाडा*(मुम्बई - अहमदाबाद हायवे) येथे गोदावरी परुळेकर या आलेल्या असताना त्यांना ठार मारण्याची योजना जमिनदार, सावकार, शेठ, हे करत आहेत, अशी खबर येथील आदिवासींना मिळाली. म्हणून त्यांच्या संरक्षणासाठी रात्र होईपर्यंत 50 मैल परिसरातून 30,000 लोकांचा समूह जमा झाला.
     मात्र सावकरांनी कपट करुन ब्रिटीश पोलीसांना बोलावून घेतले. त्या रात्री 10 वाजता patrolling करणा-या पोलिसांनी शांत बसलेल्या जमावावर गोळीबार केला. त्यानंतर जमाव आजुबाजुला गेला.
🌄🌾 दुसऱ्या दिवशी म्हणजे *दिनांक 11 ऑक्टोबर 1945* रोजी सकाळीच जनसमूह रात्रीच्याच जागी मोर्च्यांसाठी तलवाड्याला जमा झाला. पण ब्रिटीश पोलीसांनी पुन्हा गोळीबार केला. मात्र जमाव तेथून हटला नाही. दुपार पर्यंत जमाव तेथेच बसून राहिला. रात्रीपासून दुपारी 3 वाजेपर्यंत या पंधरा तासात *तीन वेळा* ब्रिटीश पोलिसांनी गाडीच्या छपरातून वरुन आदिवासींवर अमानुषपणे गोळीबार केला.
     *या गोळीबारात _जेठ्या गांगड_ आणि इतर चार जण मारले गेले. असे एकूण पाच आदिवासी शहीद झाले*. तर शंभराच्या वर लोक जखमी झाले. जखमी मध्ये 12 वर्षा पर्यंतची मुले व महिलाही होत्या.
🌄🌾 गोळीबारानंतर 17 ऑक्टोबर 1945 रोजी कोसबाड येथे वारली चळवळवाले आणि सावकरांमध्ये समेट घडवून आणण्यात सामाजिक कार्यकर्ते आचार्य भिसे गुरुजी यांना यश आले. याच दिवशी आदिवासी मजुरांनी आपला संप मागे घेतला.
     *या सेटलमेंट नुसार पुरुष मजुरांना 12 आणे तर महिला मजुरांना 8 आणे पर दिवस मजुरी देण्याचे निश्चित करण्यात आले*.
    🌿 *मात्र येथे संघर्ष संपला नाही. संघर्ष सुरूच राहिला. आणि आजही सुरूच आहे*.
    🍃--- *चळवळीची घोषवाक्य* ---🍃

1. *कसेल त्याची जमीन.* ( Land to the Tiller )
2. *आम्हाला आता जमिनीचे मालक झाले पाहिजे.* ( Now We want to be owners of the land. )
3. *राबेल त्याचे राज्य* ( He who works should rule.)

🌠 *चळवळीतील सहभागी गावे* 🌠

     या चळवळीमध्ये डाहाणू , तलासरी, उंबरगाव ( गुजरात ), पालघर, विक्रमगड, जव्हार या तालुक्यातील खूपच गावांचा सहभाग होता. पण पुढील गावांचा सहभाग आधिक उल्लेखनिय होता.
     झरी, कावडा, डोंगारी, उपलाट, दापचरी, वंकास, काजली, कोचाई, आंधेर  पाडा, मंडल पाडा  ( *तलासरी* ) ; तलवाडा, खटालवाड, नारगोल, शिरगाव ( *गुजरात* ) मुसळपाडा, नरपड, अखरमाल, महालक्ष्मी, बोर्डी ( *डाहाणू* ) ; कोंढाण, आवंढे ( *पालघर* )

🌱 *चळवळीचे परीणाम* 🌱

1. चळवळीची दखल घेऊन *कुळकायदा - The Tenancy Act of 1957* या कायद्याची निर्मित भारतीय सरकारला करावी लागली.
2. वेठबिगारी(वेठ्या), लगीनगडी, घरगडी, खावटी, पालंमोड या अन्याय पद्धतीं हळूहळू कमी झाल्या.
3. वारल्यांच्या चळवळ काळात आणि नंतरही आदिवासींचा खूप छळ झाला. खासकरुन महिलांवर झालेले शारीरिक छळ इतके भयंकर होते कि जे येथे लिहिणे शक्य नाही.
4. हि चळवळ म्हणजे आदिवासींनी सतत अनेक वर्षे केलेला संघर्ष होता. हा काही तात्पुरता उठाव नव्हता.
5. या चळवळीतून स्वातंत्रोत्तर  काळात आदिवासी संघटना निर्माण होण्यास प्रेरणा मिळाली.
( हा आदिवासींचा दुर्लक्षित झालेला वास्तव इतिहास आहे. अपेक्षा आहे की तुमच्याकडून  तो अधिक लोकांपर्यंत पोहचेल.  👏 श्री. दिनेश पारधी, पालघर )
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साहित्य सूची 

         आदिवासी व आदिवासींवर लेखन करणारे कवी, लेखक, नाटककार, कथाकार, इतिहासकार यांच्या साहित्याची एक सूची करून त्याला प्रसिद्धी देण्याचा एक प्रयत्न करत आहोत. सर्व साहित्यिकांची नावे यात देण्यात आलेली नाहीत. तरी आपणाकडे या व्यतिरिक्त काही नावे असतील तर जरूर कळवा....

1) गोदावरी परुळेकर   - जेव्हा माणूस जागा होतो 
2) कुसुम नारगोळकर  - जंगलचे राजे 
3) सुधीर फडके    - महाराष्ट्रातील आदिवासी व त्यांचे प्रश्न
4) डॉ.भाऊ मांडवकर – कोलाम
5) व्यंकटेश आत्राम  - दोन क्रांतीवीर
6) डॉ.गोविंद गारे – महाराष्ट्रातील दलित : शोध आणि बोध
7) डॉ.गोविंद गारे – सह्याद्रीतील आदिवासी : महादेवकोळी
8) ८) डॉ.गोविंद गारे – आदिवासी प्रश्न 
9) ९) ल.सु.राजगडकर – हितगुज
10) गुरुनाथ नाडगोंडे – भारतीय आदिवासी
11) सोनबाजी राजेश्वरराव हूड- गोंड धर्म आणि राजवट
12) सुदाम जाधव  - भिल्ल जीवन आणि अविष्कार
13) अ.ज.राजूरकर – चंद्रपूरचा इतिहास 
14) जगदीश गोडबोले – मोहीम इंद्रावतीची
15) डॉ.गोविंद गारे – इतिहास आदिवासी वीरांचा 
16) मोतीराम छतीराम कंगाली – गोंडी नृत्याचा पूर्वेइतिहास 
17) डॉ.गोविंद गारे व उत्तम सोनावणे – आदिवासींचे कलाविश्व
18) डॉ.विनायक तुमराम- गोंडवानातील क्रांतीवीर नारायणसिंह उईके
19) डॉ.गोविंद गारे – आद्य आदिवासी सेवक ठक्कर बापा
20) व्यंकटेश आत्राम – गोंडी संस्कृतीचे संदर्भ
21) डॉ.विनायक तुमराम – आदिवासी साहित्य : स्वरूप व समीक्षा 
22) लटारी कवडू मडावी – पताना
23) ए.बी.बर्धन – आदिवासींची न सुटलेली समस्या
24) डॉ.विनायक तुमराम – गोंड, गोंडबुरुड व थोटी : वास्तव आणि वाटचाल
25) दुर्गा भागवत – महानदीच्या तीरा 
26) नलिनी सहस्त्रबुद्धे  - राणी दुर्गावती
27) विठ्ठलसिंग धुर्वे ‘अदब’ – जब मन वीणा के तार हिल (कवितासंग्रह)
28) भुजंग मेश्राम व प्रभू राजगडकर – मोहोळ (कवितासंग्रह)
29) महाश्वेतादेवी – अरण्येर अधिकार
30) डॉ.उत्तमराव धोंगडे – वनवासा (कवितासंग्रह) 
31) अनिल नागेश सहस्त्रबुद्धे – डांगाणी
32) वाहरू सोनवणे – गोधड
33) विनायक तुमराम – गोंडवन पेटले आहे (काव्यसंग्रह)
34) प्रा.सुरेश द्वादशीवार – हाकुमी
35) भुजंग मेश्राम – उलगुलान
36) रवी कुलसंगे – इंद्रियारण्य (काव्यसंग्रह)
37) डॉ.गोविंद गारे – आदिवासी विकासाचे शिल्पकार
38) पुरुषोत्तम शेडमाके – वणसूय (काव्यसंग्रह)
39) प्रा.वामन शेळमाके – जागवा मने, पेटवा मशाली (काव्यसंग्रह)
40) उषाकिरण दादाजी आत्राम – मोटयारीन (काव्यसंग्रह)
41) ग.रा.वडपल्लीवार – मातामाईचा मुंज्या (नाटक)
42) डॉ.गोविंद गारे – अनुभूता (काव्यसंग्रह)
43) डॉ.गोविंद गारे – सह्याद्रीच्या द-याखो-यातील ठाकर आदिवासी 
44) उषाकिरण दादाजी आत्राम – अहेर (काव्यसंग्रह)
45) डॉ.मधुकर वाकोडे – झेलझपाट (कादंबरी)
46) नाना ढाकुलकर – रक्षेंद 
47) उषाकिरण दादाजी आत्राम – म्होरका (काव्यसंग्रह) 
48) उषाकिरण दादाजी आत्राम – एक झोका आनंदाचा (बालगीतसंग्रह) 
49) कुसुम आलाम – रान आसवांचे तळे (काव्यसंग्रह)
50) डॉ.मधुकर वाकोडे – सिलीपशेरा (कादंबरी)
51) एकनाथ साळवे – एनकाउंटर (कादंबरी) १९९८
52) डॉ.विनायक तुमराम – संत मुंगशुजी : एक कृतीशील तपस्वा
53) डॉ.विनायक तुमराम – धरतीआबा : जनचेतनेचे विद्रोही रूप
54) कृष्णकुमार चांदेकर – पतुसा (काव्यसंग्रह)
55) सुनील कुमरे – तीरकामठा (काव्यसंग्रह)
56) बाबा भांड – तंट्या (कादंबरी)
57) वसंत कनाके – सुक्का सुकुम (काव्यसंग्रह)
58) गो.ना.मुनघाटे – माझी काटेमुंढरीची शाळा (कादंबरी)
59) माधव सरकुंडे – सवा (कथा) 
60) प्रभू राजगडकर – येथून पुढे (काव्यसंग्रह)
61) माधव सरकुंडे – ताडम (कथासंग्रह)
62) बाबाराव मडावी – टाहा (लघुकादंबरी) 
63) बाबाराव मडावी – आकांत (आत्मकथन) 
64) भुजंग मेश्राम – आदिवासी कविता
65) व्ही आर पाकलवार – मरीमायचा भुत्या 
66) विनोद मोरांडे – Special Action Plan (एकांकिका) 
67) निवृत्ती धोंगडे – तुफानी वादळ
68) संजय दोबाडे – पितळ
69) राजू ठोकळ – पहाडी फुलोरा (काव्यसंग्रह)
70) उध्दव रोंगटे – बंडकरी (काव्यसंग्रह)
71) कुंडलिक केदारी – छळ आणि विरह 
72) डॉ.गोविंद गारे – आदिवासी मुलखाची भ्रमंती 
73) सीताराम कांबळे – वणवा (कवितासंग्रह) 
74) संजय लोहकरे – रानपाखरांची गाणी (संपादक) 
75) जसिंता केरकेट्टा – अंगोर (हिंदी कवितासंग्रह)  
76) कृष्णकांत भोजणे – आसूड (कवितासंग्रह) 
77) संजय लोहकरे – फडकी (मासिक)   
78) गो.नि.दांडेकर – भिल्लवीर कलिंग (कादंबरी) 
79) गो.नि.दांडेकर – जैत रे जैत (कादंबरी)  
80) बाबा आमटे – ज्वाला आणि फुले 
81) र.वा.दिघे –सराई (कादंबरी)
82) विजय तेंडुलकर – आक्रोश (कथा)
83) सुरेश द्वादशीवार – तांदळा (कादंबरी) 
84) भुजंग मेश्राम – औतान, मातयाम, सवारी, सोंग
85) डॉ.गोविंद गारे – आदिवासी लोककथा
86) डॉ.गोविंद गारे – आदिवासी नृत्य लय ताल सूर
87) डॉ.गोविंद गारे – वारली चित्रसंस्कृती
88) डॉ.विनायक तुमराम – शतकातील आदिवासी कविता
89) सुनील गायकवाड ---भोंग-या ,पावरी गल्लूर
90) हिरामन पाडवी --आदिम विद्रोह ,वास्तव 
91) वाहरू सोनवणे -रोडाली
92) रमजान तडवी - बितेल बाता
93) निवृत्ती धोंगडे - बाडगीची माची (कादंबरी) 
94) निवृत्ती धोंगडे - पहाडी नागिन (कादंबरी)
95) प्रमोद मांडे - झलकारी 
96) प्रमोद मांडे - आदिवासी हे मुळात हिंदूच
97) संपत ठाणकर - वारली चित्रकला भाग 1
98) संपत ठाणकर - वारली चित्रकला भाग 2
99) संपत ठाणकर - वारली चित्रकला भाग 3
100) संपत ठाणकर — कनसरी डूलं
101) संपत ठाणकर - देव बोलला
102) संपत ठाणकर -  पंकज
103) संपत ठाणकर - धिक्कार 
104) डाॅ.के.जे.सावे - द वारलीज 
105) अंधेर गुरुजी -  देवदर्शन
106) नामदेव भोसले - दैना

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*मा. राज्यपाल आणि सार्वजनिक प्रयोजनासाठी आदिवासिंच्या वहिवाटीचे/जमिनीचे हस्तांतर*
*(1)  हस्तांतरणावरील निर्बंध*: 
i) जमीन महसूल संहिता, 1966 चे कलम 36अ :
आदिवासी व्यक्तीची कोणतीही वहिवाट/जमीन महाराष्ट्र जमीन महसूल संहिता आणि कुळ वहिवाट अधिनियम, 1974 याच्या प्रारंभा पासून म्हणजे 6.7.1974 पासून शासनाची पूर्व परवानगी घेतल्याशिवाय व जिल्हाधिका-याच्या पूर्व मंजुरीने बिगर आदिवासी व्यक्तीस, संस्थास विक्रीद्वारे, देणगी देऊन, अदलाबदल करून, गहान ठेऊन, पट्ट्याने देऊन किंवा अन्य प्रकारे हस्तांतर केली जाणार नाही.
ii) पेसा कायदा, 1996 च्या कलम 4 (ड)(3) :
 ग्रामसभेला अनुसूचीत क्षेत्रातील जमिनीच्या अन्य संक्रमनास प्रतिबंध करण्यासाठी समुचित कृती करण्याचा अधिकार आहे.

(2)  पेसा कायद्यातील वरील तरतुदींच्या अनुषंगाने, जमीन महसूल संहिताच्या कलम 36अ मध्ये सुधारणा अनिवार्य असल्याने मा. राज्यपाल महोदयांनी 5व्या अनुसूचीतील परिच्छेद 5(1)च्या अधिकारात 14.6.2016 रोजी च्या अधिसूचनेद्वारे कलम 36 अ च्या पहिल्या परंतुका नंतर खालील सुधारणा जेली आहे:
कलम 36अ (1)परंतु क दुसरे:
 " राज्यातील अनुसूचीत क्षेत्रातील गावांमध्ये ग्रामसभेची मंजुरी मिळाल्या शिवाय आदिवासी व्यक्तींचा भोगवटा बिगर आदिवासी व्यक्तींकडे हस्तांतरित करण्यास जिल्हाधिकारी यांनी मंजुरी देऊ नये”.

कलम 36अ(4) :
"महाराष्ट्र जमीन महसूल संहिता आणि कूळ वहिवाट अधिनियम,1974 याच्या  प्रारंभीच्या वेळी किंवा तदनंतर कलम 36अ (1) चे  उल्लंघन करून कोणतीही वहिवाट हस्तांतरित करण्यात आल्याचे दिसून आल्यास, जिल्हाधिकारी, एकतर स्वाधिकाराने किंवा आशा वहीवाटीमध्ये हितसंबंध असणाऱ्या व्यक्तीने किंवा अनुसूचीत क्षेत्रामध्ये ग्रामसभेने ठराव करून 6.7.2004 पासून तीस वर्षाच्या आत अर्ज केल्यावर, चौकशी करून त्या बाबीचा निर्णय देईल.

*(3) राज्यपालांची सध्याची भूमिका मनमानी व तुघलकी* 
i) अलीकडे म्हणजे 14.11.2017 रोजी राज्यपाल महोदयांनी अधिसूचनेद्वारे जमीन महसूल संहिता ,1966 च्या कलम 36अ(1)च्या दुसऱ्या परंतुकानंतर खालील सुधारणा केली आहे  
" महाराष्ट्र राज्यातील अनुसूचीत क्षेत्रातील गावांमध्ये जमीन खरेदी करतांना आपसांतील कराराला मंजुरीची आवश्यकता नाही. (In villages in Scheduled Area's of Maharashtra, no sanction for the purchase of land by mutual agreement shall be necessary ) जर
i) सरकारी प्रकल्प कार्यान्वित करण्यासाठी जमीन खरेदी करणे आवश्यक आहे,आणि
ii) अशा जमीन खरेदीची देय असलेलीनुकसान भरपाईची किंमत ही योग्य व पारदर्शक पद्धतीने ठरविलेली आहे
 Mutual agreement शासन आणि वैयक्तीक  प्रकल्प बाधित आदिवासी यांमध्ये  अभिप्रेत असेल तर  कोणाच्या मंजुरीची गरज राहणार नाही हे स्पस्ट नाही.

(4) संसदेने किंवा राज्य विधान मंडळाने पारित केलेल्या *कायद्यांत सुधारणा करण्याचा अधिकार राज्यपाल यांना घटनेत दिला आहे* (5वी अनुसूची घटनेत घटना आहे). मात्र खालील कायद्यांत सुधारणा न केल्यामुळे त्याचे उल्लंघन होत आहे .  
1)  "केंद्रिय भूमी संपादन व पुनर्वस यांमध्ये पारदर्शकता पाळण्याचा हक्क अधिनियम, 2013 "
कलम 41(1)  शक्यतो, अनुसूचित क्षेत्रामध्ये जमिनीचे कोणतेही संपादन करण्यात येणार नाही. 
2) शेवटचा उपाय म्हणून  प्रात्यक्षिक तत्वावर योग्य भूसंपादन करण्यात येईल.
3) अनुसुचित क्षेत्रातील कोणत्याही जमिनीचे संपादन किंवा अन्य संक्रमण करण्याच्या बाबतीत  अधिसूचना काढण्यापूर्वी  5 व्या अनुसूचिन्वये अनुसूचित क्षेत्रातील ग्रामसभेची पूर्व सम्मती घेण्यात येईल. 
(9) त्या त्या वेळी अमलात असलेल्या कायद्याचे, नियमांचे उल्लंघन करून आदिवासीच्या मालकीच्या जमिनीचे कोणतेही अन्य संक्रमण अवैद्य असल्याचे मानण्यात येईल.
2.पाचवी अनुसूची
   अनुच्छेद ५. (२) (क)
 अनुसूचीत क्षेत्रातील अ.जनजातीतील व्यक्तीकडून किंवा त्यांच्यामध्ये आपसात जमिनीचे  हस्तांतरण होण्यास  मनाई करता येइल किंवा त्यावर निर्बंध घालता येतील.
 *राज्यपाल महोदयांनी निर्बध न घालता ते शिथिल केले आहेत.*
3.पेसा अधिनियम,१९९६
अनुच्छेद ४.(I) 
अनुसूचित क्षेत्रातील जमिनीचे विकास प्रकल्पांसाठी अधिग्रहन करण्यापुर्वी आणि प्रकल्प ग्रस्तांचे पुनर्वसन करण्यापुर्वी संबधित  अधिकारी ग्रामसभा किंवा ग्रामपंचायतीशी योग्यवेली विचारविनिमय करतील. अनुसूचित क्षेत्रातील प्रकल्पांचे प्रत्यक्ष नियोजन व कामांची अमलबजावणी यासाठी राज्य स्तरावरून समन्वय ठेवला जाईल
4. महाराष्ट्र ग्रामपंचायत अधिनियम,१९५९ ग्राम सभेचे अधिकार व कर्तव्ये 
कलम 54अ(ग)
अनुसूचित क्षेत्रातील अनुसूचित जमातीच्या जमीन हस्तांतरावर बंदी आणि बेकायदा हस्तांतरीतझालेल्या जमीनी परत देण्यासंबधी पंचायती मार्फत जिल्हाधिका-याना शिफारशी करणे . 
कलम 54अ (ल)
अनुसूचित क्षेत्रातील जमिनीचे विकास प्रकल्पांसाठी अधिग्रहन करण्यापुर्वी आणि प्रकल्प ग्रस्तांचे पुनर्वसनकरण्यापुर्वी संबधित  अधिकारी ग्रामसभेशी विचारविनिमय करतील                                                  
कलम  54ब (ब):
अनुसूचित क्षेत्रातीकोणतीही जमीन विकास प्रकल्पांसाठी अधिग्रहन करण्यापुर्वी आणि प्रकल्प ग्रस्तांचे पुनर्वसन करण्यापुर्वी  भुमीसपादन अधिकारी ग्रामपंचायतीशी विचारविनिमय करील. 
कलम 54ब(ई):
अनुसूचित क्षेत्रातील अनुसूचित जमातीच्या जमीन हस्तांतरावर बंदी आणि बेकायदा हस्तांतरीत झालेल्या जमीनी परत देण्यासंबधी   जिल्हाधिका याना शिफारशी करणे. परंतु प्रत्येक पंचायत जिल्हाधिका-याना शिफारस कलविण्यापुर्वी ग्रामसभेशी   विचारविनिमय करील 
*5. महाराष्ट्राचे पेसा नियम*:
भूमि संपादण्या पुर्वी विचार विनिमय:
नियम 26 
१) जेव्हां सरकार कोणत्याही कायध्याच्या तरतुदींन्वये अनुसूचित क्षेत्रातील भूमि संपादित करणार असेल, तेंव्हा सरकार प्रस्तावासोबत  पुढील माहिती ग्रामसभेला सादर करील
    > प्रस्तावित भूसंपादनाचा तपशील
    > नोकरी च्या संधि
    > नुकसान भरपाई ची रक्कम                       
   > पुनर्वसन आराखडा
    > प्रकल्पाचा होणारा संभावित परिणाम 
२) ग्रामसभा शासनाच्या प्रतिनिधीना समन्स पाठविल व ते मूद्यानिहाय स्पस्ट व अचूक माहिती ग्रामसभेला देतील  
३) ग्रामसभा विचारविनिमय करून भूमिसंपादनास व विस्थापित व्यक्तिच्या पुनर्वसन संदर्भात शिफारस करील 
४) या शिफारसीवर कलेक्टर विचार करील 
५) कलेक्टर ग्रामसभेच्या शिफारशींशी सहमत नसेल तर तो ती बाब पूनर्विचारार्थ ग्रामसभेला पून्हा पाठविल 
६) दुस-यांदा विचार विनिमय करून ग्रामसभेच्या शिफारशी विरुद्ध निर्णय दिल्यास कलेक्टर तशी करण्याची कारणे ग्रामसभेला देईल.
७) मोठ्या प्रकल्पांच्या बाबतीत बाधीत सर्व ग्रामस्थांशी विचारविनिमय करण्यात येईल 

*6. संयुक्त राष्ट्रसंघ घोषित मुळनिवासी (आदिवासी) अधिकार जाहिरनामा* 
अनुच्छेद 10 : 
मूळनिवासी व्यक्तींना त्यांच्या जामिनीतून वा प्रदेशातून बळजबरीने काढता येणार नाही. संबधित मूलनिवासीची स्वतंत्र लेखी पूर्वपरवानगी/संमति घेतल्याशिवाय व करारानुसार योग्य आर्थिकपर्याय दिल्याशिवाय आणि परत येण्याच्या पर्यायाशिवाय दुसऱ्या जागी पुनर्वसन करता येणार नाही. 
अनुच्छेद 19:  
प्रकल्पामुळे किंवा प्रशासनिक निर्णयाद्वारे मूळनिवासी व्यक्तींच्या जमीनी,  आणि नैसर्गिक संसाधने विशेषतः खनिजे, जल व इतर साधनसंपती यावर परिणाम होत असेल तर राज्य सरकार किंवा त्यांचे प्रतिनिधि हे प्रकल्प चालू करण्यापूर्वी मूळ निवासींची  स्वतंत्र व लिखित पूर्व सहमती संबधीत मूळनिवासी लोकांच्या प्रतिनिधी संस्थांशी विचार विनिमय करून घेईल. 
अनुच्छेद 32
(2) कोणत्याही प्रकल्पामुळें विशेतः खनिजे, जल व इतर संसाधने या संबधी विकास, उपभोग किंवा वापर करताना मूळ निवासींच्या जमिनी, भू भाग आणि संसाधने यावर परिणाम होत असेल तर प्रकल्पाला मंजुरी देण्यापुर्वी मूळ निवासी लोकांची स्वतंत्र व सूचित सहमती प्राप्त करण्यासाठी त्याच्या प्रातिनिधिक संस्थाशी राज्य विचार विनिनाय व सहकार्य करेल.

*7.प्रकल्पा साठी जमीन अधिग्रहण व सुप्रीम कोर्ट*. 
नियमगिरि बॉक्साइट माईन्स  केसमध्ये (याचिका क्रमांक 180 /2011)सुप्रीम कोर्टने 18 एप्रिल, 2013 मध्ये निर्णय दिल आहे की ग्राम सभेच्या सहमतिशिवाय  अनुसूचित क्षेत्रातील  अदिवासीची जमीन  अधिग्रहण करता येणार नाही.

*8.  वनहक्क कायदा,2006* :
 जमीन अधिग्रहण करताना आदिवासींनी वैयक्तिक व सामूहिक हक्का साठी दाखल केलेल्या दाव्याच्या संदर्भात सरंक्षण देणे बंधनकारक असेल.
(5) राज्यपाल यानी त्यांच्याआदिवासी संबधी असलेल्या *पितृतुल्य नात्याची आब राखलेली नाही* 
(1) आदिवासींच्या कल्याणासाठी पारित केलेला पेसा क़ायदा, वनहक्क कायदा, अनु जाती जमाति अत्याचार प्रतिबंधक कायदा आणि राज्यघटनेची 5 वी अनुसुची आदिवासींना  संरक्षण देण्यास राज्यपाल यांच्या 14.11.2017 च्या अधिसूचनेने पूर्णपणे अपयशी ठरनार आहे. विकासाच्या नावाखाली मोठ्या प्रमाणात होत असलेले औधोगिकरण,  खाजगीकरण, ग्लोबलायझेशन यासाठी  आदिवासींच्या जमिनीचे जबरदस्तीने होणारे हस्तांतरण थांबविण्यास राज्यपाल अपयशी ठरले आहेत हे कटु सत्य आहे. रस्ते ,धरणे, खाणी, औधोगिकरण आणि जंगल संवर्धन अशा विकास प्रकल्पसाठी एकुन बाधिताच्या 55% अर्थात 85 लाख आदिवासी विस्थापित झाले आहेत. 1990 नंतर जवळपास 1 लाख आदिवासी विस्थापित झाले आहेत याची दखल घेतलेली नाही  
(2)  ग्रामसभेला दिलेले अधिकार काढले आहेत. आणि विस्थापन व पुनर्वसन या संबधि संसोधन केलेले नाही. गरीब *आदिवासी जनतेच्या आवाजाची दाखल घेतली जात नाही*.
 (3)   सामाजिक अन्याय व सर्व प्रकारचे अत्याचार या पासून आदिवसींचे संरक्षण करण्याचे दायित्व घटनेच्या अनुच्छेद 46 अन्वये शासनाचे या पर्यायाने राज्यपाल यांचे आहे. त्याकडे *डोळेझाक झाली आहे* 
(4)  अदिवासिचे त्यांच्या जमीनी पासून विस्थापन म्हणजे घटनेच्या 5व्या अनुसूचिचे उल्लंघन आहे कारण त्याच्यां जगण्याचे साधन असलेल्या *जमीनी व नैसर्गिक साधनसंपती यावरील त्यांची मालकी/स्वामित्व व नियंत्रण या पासून ते वंचित होत आहेत*. 
(5)  विदारक सत्य हे आहे की अदिवासीचे त्यांच्या जमीनी पासून विस्थापन होत आहे आणि त्यांची पारंपरिक संस्कृति, बौद्धिक संपदा, जीवन शैली नष्ट होत आहे कारण *राज्यपाल मानवी न्यायतत्वे न पाळनाऱ्या व आर्थिकराज्यता स्थापित करणाऱ्या सरकारच्या  हातातील बाहुले झाले आहे*.
(6) घटनात्मक व दिवाणी न्यायालयचे अधिकार असलेल्या बलशाली जनजाती आयोगाला आदिवासीचे अधिकार रक्षण करण्याचा अधिकार आहे. मात्र ते आदिवासी कार्य मंत्रलयाची बिनकामाची शाखा असल्याचे दाखविण्यापालिकडे जात नाही .
(7) Parliamentary committee च्या खालील शिफारशी शासन, राज्यपाल व खासदार विसरलेले आहेत  
 " tribals should not suffer in the name of development and recommended that tribal affairs ministry should  take immediate su Moto action  whenever tribal people are agitating against  displacement and endangerment to their life.
(8) छत्तीगढ़, आंध्र प्रदेश,  मध्यप्रदेश, झारखंड, ओरीसा राज्यात अदिवासीची जमीन बिगर अदिवासिना  घेता येत नाही असे कायदे आहेत. तरीही सरकार कॉर्पोरेट कंपन्या व अदिवासी *दलालाच्या मध्यस्तिने बेनामे जमीन अधिक बळकावत आहेत.राज्यपालांनी त्यांच्या पावलावर पाऊल टाकण्यास सरकारला मदत करीत आहेत*.

लेखनात काही त्रुटी राहील्या असल्यास समाजाच्या हितासाठी पोस्ट कराव्यात तसेच *राज्यपालांच्या भूमिकेविषयी टीका टिप्पणी जरूर करावी*  

एकनाथ भोये
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।। *अखिल भारतीय गोंडआदिवासी संघ कानपुर उ०प्र०।।*
🌷🎯पाँचवी अनुसूची क्या है पढ़ो समझो और लड़ो🎯🌷

जय सेवा साथियों.... 
🌷🌾इस पोस्ट को जरूर पढे..!!

थोड़ा कुछ दिमाग में समझ आ जायेगा, हम क्या है !
*पाँचवी-अनुसूची  अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए संजीवनी बूटी के समान क्यों है..!! इसे समझना क्यों जरूरी है..?*
===================
*🔹भारत के  संविधान ( भाग 10 )में अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के बारे उल्ल्खित हैं. "पॉचवी अनुसूची" में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उपबंध हैं .संविधान के अनुच्छेद 244(1) में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए व्यवस्था की गई हैं.! मतलब पाँचवी अनुसूची के अंतर्गत धारा 244(1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रो में सिर्फ जनजाति समुदाय का ही राज चलेगा..!!* 
पांचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाली सुविधाओं को बहुत ही सरल शब्दों में आप सभी को समझाने का प्रयास..? 
साथियों....

🌷 *पाँचवी अनुसूची मतलब:-*                20 सदस्यों की टीम जिसे जनजातीय सलाहकार परिषद कहते है जो क्षेत्र के जनजाति समुदायं के विकास और संरक्षण के लिए समय समय पर शिक्षा ,स्वास्थ्य,रोजगार,कुपोषण ,बुखमरी बेरोजगारी की जानकारी हर तीन महीने या छह महीने या जब राष्ट्रपति चाहे तब जानकारी राष्ट्रपति कार्यालय को भेजती है
🎯 *पाँचवी अनुसूची मतलब :-*
 *मावा नाटे- मावा राज*,मतलब अनुसूचित क्षेत्रों में सिर्फ अनुसूचित जनजाति का राज चलेगा मतलब अनुसूचित क्षेत्रों के शासन प्रशासन का नियंत्रण अनुसूचित जनजाति समुदायं के हाथ में रहेगा ।
🍁 *पाँचवी अनुसूचि मतलब:-*
अनुसूचित क्षेत्रो में सिर्फ जनजाति की ही सरकार चलेगी! जिसमे गाँव की मिनी संसद अपने फैसले सुनाएगी, कानून बनायेगी, जिसे *ग्राम सभा* कहते है इसलिए पाँचवी अनुसूचित क्षेत्रो में देश की विधानसभा और लोकसभा में बानाए जाने वाले आम कानून जनजाति पर लागू नहीं हो सकते है।
🍁 *पाँचवी अनुसूचि मतलब :-*
अनुसूचित क्षेत्रो बैंको में पैसों का लेन देन का नियंत्रण जनजाति के हाथों में रहेगा ।
🍁 *पाँचवी अनुसूचि मतलब :-*
चाय की दूकान,पान की दूकान कपडे की दूकान,मोबाइल की दूकान,इलेक्ट्रॉनिक की दूकान ,सोने चांदी की दूकान सिर्फ जनजाति ही खोल सकता है, गैर जनजाति अनुसूचित क्षेत्रो व्यपार नहीं कर सकते है ।
🌾 *पाँचवी अनुसूचि मतलब :-*
अनुसूचित क्षेत्रो में रहने वाले जनजाति बच्चो की पढ़ाई किस भाषा में होना चाहिए ,जनजाति बच्चो को किस प्रकार का कोर्स पढ़ाया जाए, यह सब उस क्षेत्र में रहने वाले जनजाति ही निर्णय करेंगे ।
🌾 *पाँचवी अनुसूचि मतलब :-*
अनुसूचित क्षेत्रो शराब के ठेके और दुकाने नहीं खुल सकती है 
🌾 *पाँचवी अनुसूचि मतलब :-*
जिले में चपरासी से लेकर कलेक्टर तक अभी कर्मचारी अधिकारी सिर्फ जनजाति ही रहेंगे ,कहने का तातपर्य अनुसूचित क्षेत्रो में आदिवासियों को 100 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।
🌾 *पाँचवी अनुसूचि मतलब:-* 
जनजाति की मर्जी के बिना कोई भी गैर जनजाति चाहे वह कलेक्टर हो ,चाहे प्रधानमंत्री क्यो ना हो अनुसूचित क्षेत्रो में बिना जनजाति समुदायं की मर्जी से क्षेत्र में नहीं घुस सकता है।
🌷 *पाँचवी अनुसूची मतलब:-*
अनुसूचित क्षेत्रो में किसी भी प्रकार के विवाद/झगडे या ज़मीन सम्बंधित विवाद के लिए उस क्षेत्र में रहने वाले जनजाति को पुलिस थाने या कोर्ट जाने की जरूरत नहीं है ।गाँव के जनजाति समुदाय ही आपस में मिलकर विवाद का निपटारा कर सकते है।
🌷 *पाँचवी अनुसूची मतलब:-*
जनजाति की जमीन के नीचे लोहा,सोना ,चाँदी, कोयला,बॉक्सआइट और तामाम तरह की कीमती धातु का मालिक जनजाति ही रहेगा। कहने का मतलब सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा है जिसकी ज़मीन है उसकी ज़मीन से निकलने वाले सोने चांदी का मालिक वही रहेगा मतलब जनजाति समुदायं को सरकार से भीख मांगने की जरूरत नहीं वह अपने आप आमिर हो जाएगा।
🌷 *पाँचवी अनुसूची मतलब*:-
अनुसूचित क्षेत्रो में आने वाले जंगलो नदियों,तालाबो पहाड़ो वनसंपदा पर नियंत्रण सिर्फ जनजाति समुदाय का होना चाहिए..*
            *साथियों यह सब हमारे* *संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इनमें से एक भी बात का पूरी तरह पालन आजादी के 70 साल के बाद मे भी नहीं हुआ*..
🌷 *जय गोंड समाज🌷
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                                                                   आदिवासी जमातीची यादी 













                           

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